अरमानों की कलियां
सूख चली है अरमानों की कलियां फीकी पड़ रही है रिश्तों की मधुरता कौन जानता था ऐसे आत्मीय रिश्तों में भी दरारें हुआ करती हैं जो सोख लेती है सारा अपनत्व और रह जाता है अवशेष मात्र तिरस्कार, उपेक्षा और अंतहीन दूरियां...
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रश्मि
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[24 Feb 2008 14:16 PM]



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