तुम्हारा खत
नित नई पीड़ा मन में बोती है असंतुष्िट का बीज और निकलता है पौध अलगाव का मन में फिर मच जाता है द्वंद्व और मिलता है आंसुओं को न्योता आती हैं यादें जाती है मन किंकर्तव्यविमूढ़, तभी 'जिंदगी' को मिलता है तुम्हारा खत और उठता है फिर भावनाओं का ज्...
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रश्मि
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[18 Mar 2008 12:35 PM]



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