ताज़ा कविता
अपभ्रंश में हँसता हुआ आदमी मॉल के भीतर खड़ा वह आदमी निखालिस अपभ्रंश में हँस रहा था और जब हिन्दी की काया में प्रवेश कर गई हों तमाम भाषाओं की संक्रामक आत्माएँ और चमक गया हो उसका चोला इतना बड़ा बाज़ार चलता हो उसके सहारे भयानक है न किसी का अपभ्रंश में हँसना...
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विशाल श्रीवास्तव
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[05 Jul 2007 11:23 AM]



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