ताज़ा कविता

Naya Samay ......... A Hindi Literature Blog अपभ्रंश में हँसता हुआ आदमी मॉल के भीतर खड़ा वह आदमी निखालिस अपभ्रंश में हँस रहा था और जब हिन्दी की काया में प्रवेश कर गई हों तमाम भाषाओं की संक्रामक आत्माएँ और चमक गया हो उसका चोला इतना बड़ा बाज़ार चलता हो उसके सहारे भयानक है न किसी का अपभ्रंश में हँसना... [पूरी पोस्ट]
writer विशाल श्रीवास्तव
views
2
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
0
[05 Jul 2007 11:23 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix