एक आलसी कवि की डायरी
यह एक अजीब सूनेपन का समय है। सच कहूँ तो बहुत दिनों से कुछ नहीं लिखा न ब्लॉग पर और न कागज पर। शायद ध्यान दूँ तो कॉलेज के रोजनामचे और चेक बुक्स के अलावा दस्तखत भी कहीं नहीं किये। इतना सूनापन तो कभी नहीं था। कुछ कुछ जीवन बचपन की गर्मियों की दोपहर जैसा ह...
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विशाल श्रीवास्तव
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[19 Sep 2008 10:10 AM]



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