अँधेरी खाइयों के बीच
दुखों की स्याहियों के बीच अपनी ज़िंदगी ऐसी कि जैसे सोख़्ता हो। जनम से मृत्यु तक की यह सड़क लंबी भरी है धूल से ही यहाँ हर साँस की दुलहिन बिंधी है शूल से ही अँधेरी खाइयों के बीच अपनी ज़िंदगी ऐसी कि ज्यों ख़त लापता हो। हमारा हर दिवस रोटी जिसे भूखे क्षणों...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[16 Apr 2009 11:09 AM]



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