पेड़ बबूलों के
संघर्षों से बतियाने में उलझा था जब मेरा मन चला गया था आकर यौवन मुझको बिना बताए ज्यों अनपढ़ी प्रेम की पाती किसी नायिका के हाथों से आँधी में उड़ जाए। चलते रहे साँस के सँग-सँग पेड़ बबूलों के पड़े रहे अपने-अपने घर गजरे फूलों के कई गुत्थियाँ सुलझाने में उ...
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डॉ० कुअँर बेचैन
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[16 Apr 2009 11:10 AM]



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