पीड़
कोई न जाने इश्क़ की ज़ात को न कोई पहचाने तेज़ाब की बरसात को खिला फूल तो है सदा ही महकता कोई न जाने सूखे पत्तों के जज़बात को कोई न जाने दिल की पीड़ को कोई न देखे दिल होए लीरो-लीर को इश्क़ के सागर में लगाते हैं सारे ही डुबकी न कोई पहचाने शिकरे यार को क...
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vijaymaudgill
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[24 Sep 2008 10:55 AM]



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