डायरी के पन्नो से

आईना चंदा बादलों के पीछे से छिपकर आता है चंदा, किसी सुन्दरी के माथे पर लगी गोल बिंदिया सा चमचमाता है चंदा। कभी यहाँ और कभी वहां जगह बदलता जाता है चंदा। कभी कभी इस विशाल आसमान में घर भी भटक जाता है चन्दा । कभी मंदिरों के पीछे, तो कभी दरख्तों के ऊपर कभी बाद... [पूरी पोस्ट]
writer प्रियम्बरा
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[25 Nov 2008 06:57 AM]

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