मृग-तृष्णा
मृग-तृष्णा एक दिन पडी थी माँ की कोख मे अँधेरे मे सिमटी सोई चाह कर भी कभी न रोई एक आशा थी मन मे कि आगे उजाला है जीवन मे एक दिन मिटेगा तम काला होगा जीवन मे उजाला मिल गई एक दिन मंजिल धड़का उसका भी दुनिया मे दिल फिर हुआ दुनिया से सामना पडा फिर से स्वयं को...
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सीमा सचदेव
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[20 Jan 2009 04:12 AM]



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