परछाई

मेरी आवाज़ परछाई घूरती हुई क्रूर निगाहे झपट लेने को लालायित पसरा केवल स्वार्थ दुर्विचार,आडम्बर नही बचा इससे कोई घर बोई थी प्यार की फसल मिला नफरत का फल सच्चाई की जमीन को रौन्दता झूट का हल मिठास मे छिपा जानलेवा जहर भूखी निगाहो मे लालच का कहर रह गया केवल अकेलापन क... [पूरी पोस्ट]
writer सीमा सचदेव
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[20 Jan 2009 04:04 AM]

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