मेरे मन के तार !

दिव्य दृष्टि कुछ तार मेरे मन के उलझे हुये हैं कुछ सार एस बात के सुलझे हुये हैं / रौशनी मिली तो उठाई ना नज़र, अब तो सारे चिराग बुझे हुये है / कुछ तार मेरे मन के…………. दुखाया है बड़ी बेरहमी से तेरा दिल, अहसास एस बात के अब मुझे हुये है / कुछ तार मेरे मन के…………… किस क़द... [पूरी पोस्ट]
writer Sanjay Sharma
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[14 Jun 2007 01:03 AM]

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