"यदा-यदा ही धर्मस्य ग्लान्लिर भवति भारतः....."
कला का सम्मान हम सभी उत्साहित होकर करते आये हैं.कला का व्यापक विस्तार हो इसके लिए प्रकृति ने पचुर maatraa मे जगह दी है,पर आज कल ये फ़ैलाने के बदले सिकुड़ता नज़र आ रह है.ये महसूसा ही नही, नंगी आंखों से देखा जा सकता है, कुठाराघात को हम सब ने मिलकर सहा ह...
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Sanjay Sharma
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[14 Jun 2007 07:10 AM]



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