मेरे मन के तार !
सन् १९८४ मे मेरे मन की बात कागज़ पर उतर आई थी ।आज अचानक, न जाने क्यों ब्लॉग पर उतरने को बेताब दिखी । पर मैंने इसे ब्लॉग पर उतारा नही, चढाया है । कुछ तार मेरे मन के उलझे हुए है / कुछ सार इस बात के सुलझे हुए हैं // रोशनी मिली तो उठाई न नज़र / अब तो सारे...
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Sanjay Sharma
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[09 Jun 2008 05:51 AM]



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