मेरी दाल गला दो ना !

दिव्य दृष्टि मुस्कान दे आए सुबह को, शाम की सुध लेगा कौन ? उदास हो रही है साझ एक दीया जला दो ना ! अछूत बुझती नींद आंखों को या दोनों पलकों में झड़प हुआ इन थकी,खुली आंखों में, एक सुंदर ख्वाब पला दो ना ! घुल-मिलकर अस्तित्व मिटा लेता पर जग सारा, खारा पानी है बस तुम अप... [पूरी पोस्ट]
writer Sanjay Sharma
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[07 Jul 2008 07:41 AM]

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