अब सपने बिकने लगे हैं

आत्मदर्पण साथियों कुछ दिनों से कोई भी पोस्ट नहीं डाल पाया आज अचानक एक पुरानी कविता मिली , उसमें थोड़ा सा बदलाव कर के प्रस्तुत कर रहा हूँ अब सपने बिकने लगे हैं वे सपने जो रोज सोते हुए आपके और मेरी नीदों मैं आते हैं , वे दरअसल मेरे और आपके सपने नहीं हैं सपने अब प... [पूरी पोस्ट]
writer प्रशांत दुबे
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[29 Dec 2008 08:57 AM]

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