आत्मदर्पण
साथियों ! नीचे लिखी कविता तथा यह आदर्श वाक्य मेरे आदरणीय मामाजी डॉ. एम. एल. तिवारी द्वारा लिखे गये हैं। वे भापाल में रहते हैं, शासकीय सेवा में है। कल उनसे मिला तो लेकर आया ब्लॉग के लिये । आपके लिये पेष कर रहा हूं। आग लगाना मत सीखो लगा सको तो बाग लगाओ...
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प्रशांत दुबे
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[11 Apr 2009 07:11 AM]



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