फ़लसफा : ज़िंदगी का

फ़लसफा : ज़िंदगी का सुबह-सुबह खिलती हुई धूप और फुदकते हुए पंछी हाँ ये समय है इमली वाली गली में दर्जी की दुकान खुलने का और चूड़ी वाले का महिलाओं को रोककर चूड़ी पहनने का आग्रह करने का . . तुम मसरूफ हों हो सकता है गूँथ रही हो आटा और हवा बिखरा देती है मुँह पर गेसू तुम झुँझलाक... [पूरी पोस्ट]
writer धीर.
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[09 May 2009 03:46 AM]

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