दोस्त किसको माने हम
लुटने का अंदेशा है यहाँ घर के ही पहरेदारों से खुद को बेगानी दुनिया में महफूज़ कैसे माने हम . दिल कहता है तेरे फैसले,हैं सच्चाई पे ज़माने के पर्दे अक्स-ए-हकीक़त क्या है दोस्त,बतलाओ कभी तो जाने हम . मुद्दतों से सुनते आये हैं तारीफ़ कूचे-कूचे में कभी बद...
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धीर.
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[05 Aug 2009 15:08 PM]



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