वे अल्हड़ दिन....

फ़लसफा : ज़िंदगी का वे बादलों पर बैठकर आसमान घूमने के दिन थे महकते फूलों पे बैठी तितलियाँ पकड़ने के दिन थे वे पोसमपा खेलने झूला झूलने के दिन थे नंगे पाँव गाँव की सरहदे पार करने के दिन थे वे शीशम की छाँव तले चिड़ियाँ निहारने के दिन थे रहट की बाल्टियाँ चढाने,उतारने के दिन... [पूरी पोस्ट]
writer धीर.
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[15 Aug 2009 18:51 PM]

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