पाँच क्षणिकाएं
१ : रिश्ते प्रतीकों को रूपकों,उपमाओं में बदलकर मैंने अपनी बात क्या कही वह सबकी हो गयी . सबके सब रिश्ते टंगे हैं कच्ची डोर की अरगनी पर सबको भय लगा है यहाँ ग्रहण लग जाने का २ : जीवन हम जिन्दा लाशें बने किसी अप्रत्याशित कल्पना में डूबे रहे इस ज़िन्दगी म...
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धीर.
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[15 Aug 2009 20:38 PM]



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