न हँसे कोई, न मुस्कुराए, बस ठहाका लगाया जाय

ठहाका ज सुबह सुबह् एक मेल मिला प्रिय बसंत जी, किसी ने ख़ब ही कहा है- हँसना रवि की प्रथम किरण सा, कानन मेंनवजात शिशु सा . हमारा वर्तमान इतना विचित्र है,की अपनी इस सहज ,सुलभ विशिष्टताको हमने ओढ लियाहै, हर आदमी इतना उदास है,की उसे हँसने के लिए लाखों जतन करनेप... [पूरी पोस्ट]
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[04 Aug 2007 05:16 AM]

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