अर्थ!
रिश्तों के बदले अर्थों में अब कौन किसी का होता है। रिश्ते बेमानी हो जाते हैं, जब अर्थ पास नहीं होता है। रिश्ते खंडित होते देखे जब अर्थ बीच में आता है। इस पैसे की खातिर ही तो अपना अपनों को खोता है। एक निर्बल निर्धन ही तो है, जो रिश्तों को पानी देता है...
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रेखा श्रीवास्तव
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[03 Nov 2008 03:50 AM]



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