विडंबना

hindigen आज अकेले, बीमार, बेवश चुपचाप पड़ी पर छत पर लटके पंखे के हर कोने को देख रही है। सारी बत्तियां बुझ चुकी है कब की, अब तो बंद हो चुकी है, रसोई में बर्तनों की खनक भी , वह भूखी शायद कोई पूछे खाना लाये, पर यह क्या? रात गहराती गई वह भूखे पेट करवटें बदलती रही... [पूरी पोस्ट]
writer रेखा श्रीवास्तव
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[22 Dec 2008 04:46 AM]

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