लघुकथा-- मजबूरी

JHAROKHA रोज सबेरे इधर उधर काम करती हुई बरबस ही निगाह किचेन की खिड़की से बाहर चली जाती है ।रोज की तरह मैं देखती हूं उस औरत को जो अपने कंधे पर बोरे जैसा बड़ा सा थैला लटकाये अपने दो छोटे छोटे बच्चों के साथ अपने काम में जुटी होती है ।पूरी तन्मयता के साथ ।कूड़ा बीनत... [पूरी पोस्ट]
writer JHAROKHA

लघुकथा

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[22 Jun 2009 21:49 PM]

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