ग़ज़ल
दीदारे यार होने का जरा जश्न तो मनाने दो, यार मेरा फ़िर कहीं पर्दा नशीं न हो जाये। बड़ी मुद्दत से हमको तो खुदा से ये शिकायत थी, ये ख्वाब उनकी बेरुखी से फ़िर न खाक हो जाये। पर खुदा ने भी इनायत की मेहरबां हुआ हम पर, मोहलत इतनी दे ही दी तमन्ना अधूरी न रह जा...
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JHAROKHA
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[01 Jul 2009 22:41 PM]



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