ज़िन्दगी पर दो

Grey Rainbow / स्याह इंद्रधनुष पहली—— (जोगिन्दर साहब, आप से आज हुई बातों से प्रेरित । आपके आगरे के घर की दीवारों पर उभर आई पपड़ीयों को समर्पित) दबे पैर निकली जा रही हो, तुम तेज़ रफ़्तार से चलकर मेरे कदमों के नीचे से चुपचाप – ज़िन्दगी । ज़रा रुको तो, दम तो लो, अभी बचपन... [पूरी पोस्ट]
writer Grey Rainbow - स्याह इंद्रधनुष

poetry

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[24 Aug 2009 15:34 PM]

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