जा रहे हो कौन पथ पर ?
पथ को तुम देखो जरा मन की आँखें खोलकर सत्यपथ को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर ! ना प्यार के साए है इस पथ ना कोई हमराह है काफिलों को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर ! ना कोई मंजिल है इस पथ ना लौटने के है निशाँ इंसानियत को छोड़कर तुम जा रहे हो कौन पथ पर...
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निर्झर'नीर
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[19 Mar 2009 06:41 AM]



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