कर्म और किस्मत
हम भी चले थे शौक से थी जिधर मंजिल मेरी दिल में था जोश-ओ-जुनूं और ख्वाब थे दौलत मेरी । नभ पे थी मेरी निगाहें उड़ने की चाहत मेरी होसलों के पंख थे और साथ थी हिम्मत मेरी । राह में पर्वत थे ऊँचे दूर थी मंजिल मेरी तूफ़ान पीछे रह गए थी चाल कुछ ऐसी मेरी थी मो...
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निर्झर'नीर
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[19 Mar 2009 06:09 AM]



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