आत्मा !

If  tired, rest here माया मरी न मन मारा, मर मर गया शरीर आशा तृष्णा न मरी कह गए दास कबीर जो भी विचार हमारे मस्तिष्क से गुज़रता है दरअसल हम उसे सुनते हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई हमारे विचारों को पढ़ रहा है। शायद इसी वजह से यह आभास होता है के इस शरीर से परे भी कोई अमूर्... [पूरी पोस्ट]
writer Kali Hawa
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[04 Oct 2008 23:42 PM]

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