खोलो प्रियतम खोलो द्वार

If  tired, rest here शिशिर कणों से लदी हुई कमली के भीगे हैं सब तार चलता है पश्चिम का मारुत ले कर शीतलता का भार भीग रहा है रजनी का वह सुंदर कोमल कबरी भाल अरुण किरणसम कर से छु लो, खोलो प्रियतम खोलो द्वार - जयशंकर प्रसाद बचपन में ये कविता पढ़ी थी, आज तक नही भूला। अफ़सोस हिन्द... [पूरी पोस्ट]
writer Kali Hawa
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[31 Oct 2008 10:32 AM]

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