हाँ बाबूजी, मै वेश्‍या हूँ

आशुतॊष मासूम... उस भीड भरी राहों मे भी एक सुनसान सी जगह है, हर रोज देखता हूँ, उन्हे वहां पर, संध्या की बेला के साथ, सजधज वो वहॉं आ जाती है, खडी तो खामोश ही रह्ती है, पर आँखें उन्की ना जाने किसको बुलाती हैं, अगर कोई आ जाये, तो मुस्कुराती है, और फिर चुपचाप उन्के साथ च... [पूरी पोस्ट]
writer आशुतॊष
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[20 Nov 2007 08:47 AM]

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