मालवा के लोक-नाट्य माच में थिरकतीं हैं मानवीय संवेदना
मालवी माच में केवल मनोरंजन नहीं है, इसमें लोकरंजन है। मनोरंजन तो केवल मन रंजन करता है और वह केवल मन को रास आता है। मनोरंजन तो बदलता रहता है, व्यक्ति की मानसिक स्थिति के अनुसार और इसीलिए वह अपनी-अपनी रूचि से बनता-बिगड़ता भी है। इसमें केवल आमोद, प्रमोद,...
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मालवी जाजम
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[08 Apr 2008 23:29 PM]



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