तुम ठूंठ नहीं हो....
मत कहो स्वयं को ठूंठ तुम... क्योंकि मैं जानती हूं.... तुम ठूंठ नहीं हो.... तुम भी एक छायादार.... घने पेड़ हो.... बस वक्त की कड़ी धूप... और गरम हवाओं के थपेड़ों ने... सुखा दिया तुम्हारी नमी को.... और तुमने अपने पत्ते गिरा दिये... और बन गये तुम छायाविहीन....
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[07 Jul 2007 12:52 PM]



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