वादा....
समंदर.... साहिल... बलखाती मौजें... भीगे अलसाये पत्थर.. सिंदूरी शाम.... थका-थका सा सूरज.. लौटते पंछी.... गीली पोली सी रेत... धंसते हैं तेरे-मेरे कदम... बनाते हैं निशां... हम हाथ थामे.. चलते हैं.. नंगे पैर... आगे... कभी.. जब.. पीछे मुड़ के देखती हूं......
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[20 Oct 2007 15:51 PM]



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