एह्सास की तलाश......
साथ होकर भी जाने क्यूं.... तन्हाई का एह्सास है... हाथ थामे रहता है कोई... फ़िर भी लगता खाली हाथ है... जाने कैसा सूनापन गहराया..... चलती हूं जिस भीड़ में.... इंसानों का नहीं.... बस परछांईयों का साथ है..... 'सच'... में जीने को जाने क्यूं.... दिल करता ही...
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[20 Mar 2008 11:44 AM]



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