मन कुन्तो मौला
नुसरत साहब ने परंपरागत सूफ़ी गायकी से निकलकर इस विधा को जिस तरह से आमजन से जोड़ा, वह बेमिसाल था। वे पिछली सदी के चंद बेहद ज़रूरी और प्रभावी कलाकारों में से एक थे। उनका असमय जाना बेहद दुखद था। यदि वे जीवित होते तो हमारे पास कुछ और अच्छा संगीत होता। उनके...
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[05 Jan 2009 12:55 PM]



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