नित्य- निरंतर
मानवीय सोच और संवेदनाओं को समर्पित दो लघु कविताएं लिख रहा हूं। लिखने के लिये बार-बार निरंतरता बनाने का प्रयास करता हूं लेकिन हर बार कोई न कोई कारण गैप बना देता है। यों ही मानव क्यों उठा रहा अपनी अर्थी स्व कंधों पर। इस शहर से उस शहर तक अन्जाने खामोश प...
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betuki@bloger.com
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[12 Dec 2008 13:54 PM]



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