रंज-ऐ-सफर की कोई निशानी तो साथ हो.........
शजर न बेच कोई सायबान रहने दे गए ज़माने का कोई निशान रहने दे तुझे नही है ज़रूरत,तू क्यों गिराता है मेरे लिए तो मेरा अस्तान रहने दे सजी हुयी हैं जो कब से बस्तियां न उजाड़ ये ख्वाहिशों की नमो के निशाँ रहने दे तेरा तो तीर भी भारी है इस परिंदे से न खींच ज़...
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rakhshanda
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[11 Jul 2008 02:26 AM]



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