कुछ तुम भी मगरूर थे...
कुछ तुम भी मगरूर थे, कुछ मैं भी मगरूर था अगरचे ना तुम मजबूर थे, ना मैं मजबूर था एक जिद के झोंके ने दो कश्तियाँ, मोड़ दीं दो तरफ वरना दूरियों का ये ग़म किस कमबख्त को मंजूर था खतामंदी का अहसास दफ़न किये हम अपने सीने में कहाँ तक बहलायें दिल को, सब वक़्त...
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क्षितीश
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[21 Oct 2008 04:16 AM]



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