जब तेरी नज़रों का...
जब तेरी नज़रों का नूर था, मैं कितना मगरूर था अब लगता है दो दिन का बस वो तो एक सुरूर था दरअस्ल एक सपना था, पलकों से फिसल गया आँख खुली तो पाया- मैं तुमसे बहुत, बहुत दूर था दर्द की जागीर से जाने कब एक क़तरा निकल गया अश्कों को सम्हाल रखूँ, इतना भी ना शऊर...
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क्षितीश
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[19 Sep 2008 06:52 AM]



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