अज़ीब दिल है...
अज़ीब दिल है, दर्दे-दिल को ढूँढता है कोई मक़तूल अपने क़ातिल को ढूँढता है सरे-शाम से चरागे-चश्मे-नम लिए एक मुसाफिर अपनी मंजिल को ढूँढता है कभी अपने खाली हाथ देखता है तो कभी गुज़श्ता उम्र के हासिल को ढूँढता है उठकर चला तो आया अपनी रौ में मगर रह-रहकर तेरी...
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क्षितीश
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[25 Nov 2008 11:37 AM]



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