वस्ल के दिन याद आए...
वस्ल के दिन याद आए, हिज़्र की रातें याद आईं तुम याद आए तो न जाने कितनी बातें याद आईं पहरों-पहर पहलू में जब खामोश धड़कते थे दो दिल चुपचाप-सी पहले-पहल की वो मुलाकातें याद आईं बूँद-बूँद रूह को भिंगोने की ख़्वाहिश रखती हों जैसे तेरे गुनगुनाते लबों से नज़्मो...
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क्षितीश
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[28 Nov 2008 01:35 AM]



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