लेकिन!
मैं सोचता था- तुम्हारे होठों के खुलते-बंद होते सीपियों में मुस्कुराहटों के अथाह मोती हैं शायद तुम उनमें से कुछ मुझे भी दोगे... शायद मैं उन्हें लेते-लेते थक जाऊँगा, पर वो कभी ख़त्म न होंगे... लेकिन, मुझे क्या पता था- कि एक दिन जब तुम चले जाओगे वो... त...
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क्षितीश
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[28 Nov 2008 09:40 AM]



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