आज फिर...
आज फिर, एक अनमना-सा अहसास आकर बैठ गया मेरे पास, न जाने कहाँ से एक टुकड़ा खामोशी पसर गई आँखों में और मैंने फिर से अपनी तन्हाई के मासूम-से चेहरे को जी-भर सहलाया था, चेहरा- जिस पर आँसुओं की कुछ सूखी लकीरें थीं अब तक, जैसे अभी-अभी रोकर आई हो! मैं चाहता था...
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क्षितीश
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[09 May 2009 17:28 PM]



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