गीली-गीली छू का अर्थशास्त्र

मन उवाच..... गीली गीली छू, और रात कट गई। जादू नहीं है। पसीने ने पूरी रात को गीला बना दिया है। चीकट बिस्तर की चादर यूं बदन को चिपट गई जैसे रसखान के दोहों में मिलन के लिए सदियों से तड़प रही थी। लगता है सीली सीली विरहा की रात का जलना वाले गाने का आइडिया भी ऐसी ही कि... [पूरी पोस्ट]
writer मधुकर राजपूत
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[24 Jun 2009 06:24 AM]

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