अपराजिता
लड़ने और जूझने का दम बचपन से ही भरती थी। क्या पता था कि पल-पल प्रतिपल यही दिनचर्या में शामिल हो जाएगा। उसके लिए कभी कोई हरा भरा चिकना रास्ता नहीं था और शायद इसीलिए फिसलने का डर भी कम था। रास्ते बीहड़ सुनसान या थकान से भरे हों तो उठते गिरते आदमी संभल...
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खुली किताब
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[08 Sep 2009 03:52 AM]



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