तेरा नाम लेकर
गिरती हुई शाम को कितनी बार संभाला है रात में डूब डूब कर न जाने कितनी बार सुबह को निकाला है अंधेरे से डरते हुए चाँद को कितनी बार फलक पे टिकाकर सुलगाया है थके हुए सूरज को बादलो की चादर उडाकर न जाने कितनी बार सुलाया है जब जब भी कांपी है ये कायनात जब जब...
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tarun
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[01 Dec 2008 15:40 PM]



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