ग़ज़ल
भोर का वहम पाले उनको ज़माना हुआ। कब सुनहरी धूप का गुफाओं में जाना हुआ। रख उम्मीद कोई दिया तो जलेगा कभी, भूख के साथ पैदा हमेशा ही दाना हुआ। मर्यादा में था तो सुरों में न ढल सका, शब्दों को नंगा किया तो ये गाना हुआ। तरकश उनका तीरों से हो गया ख़ाली मगर, मे...
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प्रकाश बादल
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[06 May 2009 02:36 AM]



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