ग़ज़ल
भाव कुंद कर दे वो पैमाना न दरमियान रख। मेरे ख्यालों की बस ऊंची उड़ान रख। दिल से दिल का कोई फासला न हो, कुछ इस सलीके से गीता और कुरान रख। बहुत हुई महलों की फिक्र, छोड़ दे, बेघरों के हिस्से में भी कोई मकान रख। बस्तियां रौंद लेगी ये नदी रोकी हुई, ज़रूरत से...
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प्रकाश बादल
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[06 May 2009 02:36 AM]



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