अनछुए लम्हें

अंतर्मन गर्मियों की छुट्टियों में जब भी लखनऊ जाते थे तो पापा एक बार हमें वज़ीरगंज जरुर ले जाते थे। अपना पुराना घर दिखाने। सडक के एक ऒर खडे होकर बताते देखो वो वाला घर हमारा था। "दादी यहां बैठी रहती थी। वो ऊपर जो कमरा दिख रहा है ना वो मेरा और आनन्द का था"। उनके... [पूरी पोस्ट]
writer anuradha srivastav
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[08 Jan 2008 06:12 AM]

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